श्री मद गुरुभ्यो नमः

श्री मद गुरुभ्यो नमः

Tuesday, October 19, 2010

संस्कृत और अन्य भाषाएँ

 संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका ख़ास रिश्ता है। देवनागरी लिपि असल में संस्कृत के लिये ही बनी है, इसलिये इसमें हरेक चिह्न के लिये एक और सिर्फ़ एक ही ध्वनि है। देवनागरी में १२ स्वर और ३४ व्यंजन हैं। देवनागरी से रोमन लिपि में लिप्यन्तरण के लिये दो पद्धतियाँ अधिक प्रचलित हैं : IAST और ITRANS. शून्य, एक या अधिक व्यंजनों और एक स्वर के मेल से एक अक्षर बनता है। 


स्वर

ये स्वर संस्कृत के लिये दिये गये हैं। हिन्दी में इनके उच्चारण थोड़े अलग होते हैं।
वर्णाक्षर “प” के साथ मात्रा IPA उच्चारण "प्" के साथ उच्चारण IAST समतुल्य अंग्रेज़ी समतुल्य हिन्दी में वर्णन
/ ə / / pə / a short or long en:Schwa: as the a in above or ago बीच का मध्य प्रसृत स्वर
पा / α: / / pα: / ā long en:Open back unrounded vowel: as the a in father दीर्घ विवृत पश्व प्रसृत स्वर
पि / i / / pi / i short en:close front unrounded vowel: as i in bit ह्रस्व संवृत अग्र प्रसृत स्वर
पी / i: / / pi: / ī long en:close front unrounded vowel: as i in machine दीर्घ संवृत अग्र प्रसृत स्वर
पु / u / / pu / u short en:close back rounded vowel: as u in put ह्रस्व संवृत पश्व वर्तुल स्वर
पू / u: / / pu: / ū long en:close back rounded vowel: as oo in school दीर्घ संवृत पश्व वर्तुल स्वर
पे / e: / / pe: / e long en:close-mid front unrounded vowel: as a in game (not a diphthong) दीर्घ अर्धसंवृत अग्र प्रसृत स्वर
पै / ai / / pai / ai long en:diphthong: as ei in height दीर्घ द्विमात्रिक स्वर
पो / ο: / / pο: / o long en:close-mid back rounded vowel: as o in tone (not a diphthong) दीर्घ अर्धसंवृत पश्व वर्तुल स्वर
पौ / au / / pau / au long en:diphthong: as ou in house दीर्घ द्विमात्रिक स्वर
संस्कृत में दो स्वरों का युग्म होता है और "अ-इ" या "आ-इ" की तरह बोला जाता है। इसी तरह "अ-उ" या "आ-उ" की तरह बोला जाता है।
इसके अलावा हिन्दी और संस्कृत में ये वर्णाक्षर भी स्वर माने जाते हैं :
  • ऋ -- आधुनिक हिन्दी में "रि" की तरह, संस्कृत में American English syllabic / r / की तरह
  • ॠ -- केवल संस्कृत में (दीर्घ ऋ)
  • ऌ -- केवल संस्कृत में (syllabic retroflex l)
  • ॡ -- केवल संस्कृत में (दीर्घ ऌ)
  • अं -- आधे न्, म्, ङ्, ञ्, ण् के लिये या स्वर का नासिकीकरण करने के लिये
  • अँ -- स्वर का नासिकीकरण करने के लिये (संस्कृत में नहीं उपयुक्त होता)
  • अः -- अघोष "ह्" (निःश्वास) के लिये

व्यंजन

जब कोई स्वर प्रयोग नहीं हो, तो वहाँ पर 'अ' माना जाता है । स्वर के न होने को हलन्त्‌ अथवा विराम से दर्शाया जाता है । जैसे कि क्‌ ख्‌ ग्‌ घ्‌ ।
Plosives / स्पर्श
अल्पप्राण
अघोष
महाप्राण
अघोष
अल्पप्राण
घोष
महाप्राण
घोष
नासिक्य
कण्ठ्य / kə /
k; English: skip
/ khə /
kh; English: cat
/ gə /
g; English: game
/ gɦə /
gh; Aspirated /g/
/ ŋə /
n; English: ring
तालव्य / cə / or / tʃə /
ch; English: chat
/ chə / or /tʃhə/
chh; Aspirated /c/
/ ɟə / or / dʒə /
j; English: jam
/ ɟɦə / or / dʒɦə /
jh; Aspirated /ɟ/
/ ɲə /
n; English: finch
मूर्धन्य / ʈə /
t; American Eng: hurting
/ ʈhə /
th; Aspirated /ʈ/
/ ɖə /
d; American Eng: murder
/ ɖɦə /
dh; Aspirated /ɖ/
/ ɳə /
n; American Eng: hunter
दन्त्य / t̪ə /
t; Spanish: tomate
/ t̪hə /
th; Aspirated /t̪/
/ d̪ə /
d; Spanish: donde
/ d̪ɦə /
dh; Aspirated /d̪/
/ nə /
n; English: name
ओष्ठ्य / pə /
p; English: spin
/ phə /
ph; English: pit
/ bə /
b; English: bone
/ bɦə /
bh; Aspirated /b/
/ mə /
m; English: mine
Non-Plosives / स्पर्शरहित
तालव्य मूर्धन्य दन्त्य/
वर्त्स्य
कण्ठोष्ठ्य/
काकल्य
अन्तस्थ / jə /
y; English: you
/ rə /
r; Scottish Eng: trip
/ lə /
l; English: love
/ ʋə /
v; English: vase
ऊष्म/
संघर्षी
/ ʃə /
sh; English: ship
/ ʂə /
sh; Retroflex /ʃ/
/ sə /
s; English: same
/ ɦə / or / hə /
h; English behind
नोट करें :
  • इनमें से ळ (मूर्धन्य पार्विक अन्तस्थ) एक अतिरिक्त वयंजन है जिसका प्रयोग हिन्दी में नहीं होता है। मराठी और वैदिक संस्कृत में इसका प्रयोग किया जाता है।
  • संस्कृत में का उच्चारण ऐसे होता था : जीभ की नोंक को मूर्धा (मुँह की छत) की ओर उठाकर जैसी आवाज़ करना। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनि शाखा में कुछ वाक्यों में का उच्चारण की तरह करना मान्य था। आधुनिक हिन्दी में का उच्चारण पूरी तरह की तरह होता है।
  • हिन्दी में का उच्चारण ज़्यादातर ड़ँ की तरह होता है, यानि कि जीभ मुँह की छत को एक ज़ोरदार ठोकर मारती है। हिन्दी में क्षणिक और क्शड़िंक में कोई अंतर नहीं है, परन्तु संस्कृत में ण का उच्चारण की तरह बिना ठोकर मारे होता था, अंतर केवल इतना कि जीभ के समय मुँह की छत को कोमलता से छूती है।

संस्कृत भाषा की विशेषताएँ

१) संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं किसी संशय की संभावना नहीं है।
२) इसकी सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है।
३) सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी होने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है।
४) इसे देवभाषा माना जाता है।
५) संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा भी है अतः इसका नाम संस्कृत है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है।
६) शब्द-रूप - विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं।
७) द्विवचन - सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।
८) सन्धि - संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो शब्द निकट आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है।
९) इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।
१०) शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।
११) संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे - अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।
१२) संस्कृत विश्व की सर्वाधिक 'पूर्ण' (perfect) एवं तर्कसम्मत भाषा है।
१३) देवनागरी एवं संस्कृत ही दो मात्र साधन हैं जो क्रमश: अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं। इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है।
१४) संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरन्तर होती आ रही है। इसके कई लाख ग्रन्थों के पठन-पाठन और चिन्तन में भारतवर्ष के हजारों पुश्त तक के करोड़ों सर्वोत्तम मस्तिष्क दिन-रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं। पता नहीं कि संसार के किसी देश में इतने काल तक, इतनी दूरी तक व्याप्त, इतने उत्तम मस्तिष्क में विचरण करने वाली कोई भाषा है या नहीं। शायद नहीं है।


भारत और विश्व के लिए संस्कृत का महत्त्व

  • संस्कृत सभी भारतीय भाषाओं की माता है। इनकी अधिकांश शब्दावली या तो संस्कृत से ली गयी है या संस्कृत से प्रभावित है। पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय भाषाओं में अधिकाधिक एकरूपता आयेगी जिससे भारतीय एकता बलवती होगी। यदि इच्छा-शक्ति हो तो संस्कृत को हिब्रू की भाँति पुनः प्रचलित भाषा भी बनाया जा सकता है।
  • हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में हैं।
  • हिन्दुओं के सभी पूजा-पाठ और धार्मिक संस्कार की भाषा संस्कृत ही है।
  • हिन्दुओं, बौद्धों और जैनों के नाम भी संस्कृत पर आधारित होते हैं।
  • भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली भी संस्कृत से ही व्युत्पन्न की जाती है।
  • संस्कृत, भारत को एकता के सूत्र में बाँधती है।
  • संस्कृत का प्राचीन साहित्य अत्यन्त प्राचीन, विशाल और विविधतापूर्ण है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, और साहित्य का खजाना है। इसके अध्ययन से ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति को बढ़ावा मिलेगा।
  • संस्कृत को कम्प्यूटर के लिये (कृत्रिम बुद्धि के लिये) सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।

Monday, October 04, 2010

संस्कृत-पाठः ४

संस्कृत भाषायां वार्तालापः अतीव सरलः 
पश्यन्तु -
अहं भूपेन्द्रः 
अद्य सोमवासरः 
चित्रं पश्यन्तु पश्चात्स्मरन्तु 
                                                                      
                                                                       पठति 


                                                                          खादति 

                                                                              हसति 





                                                                            वदति 

                                                                               लिखति 

                                                                                 चलति



                                                                                                 
                                             धावति
                                             
                                               पश्यति




                                          ताडयति


                                         पाठयति





                                                                                                            
                                            पिबति


                                            नमति



                                            चिन्तयति


Thursday, September 30, 2010

संस्कृत पाठः 3


अत्र वयं किं अस्ति? किं नास्ति? पठामः
अस्ति ( है) नास्ति ( नहीं है )
देखो! यहाँ क्या क्या है ?

                                            

कक्षा अस्ति, छात्रः अस्ति , छात्र अस्ति ,
देखो! यहाँ क्या -क्या है ?
         
गजःअस्ति , वाहनं अस्ति, वृक्षः अस्ति ,
देखो और बताओ यहाँ क्या-क्या नहीं है ?
मानवः नास्ति,जलं नास्ति,गृहं नास्ति, बालकः नास्ति,बालिका नास्ति ,
ऐसे ही हम अन्य वाक्यों का अभ्यास करें | 
घर में हमारे सामने जो भी चीज़ें हों उनका वाक्य में प्रयोग करें |
आपको यह लेख कैसा लगा? जरूर लिखें 
                     धन्यवादः 

Friday, September 10, 2010

संस्कृत-पाठः 2

नमो नमः
अद्य वयं आगामी पाठे अभ्यासं करिष्यामः ॥ एकः अत्र विचारः अपि अस्ति यत् वयं चिन्तयामः संस्कृतं कठिनम् अस्ति ॥ मम निवेदनम् अस्ति नास्ति कापि एतादृशी सरला भाषा ॥ विश्वे अस्यां भाषायां एव प्रचुर ,सम्यक, शिष्ट-प्रयोगयुत सर्वं मिलति ॥ अतः वदन्तु संस्कृतं॥
मम नाम भूपेन्द्रः 
पाठ्य- विन्दवः -             { अहं , भवान् , भवती }
अहं शिक्षकः 
भवान् कः ? { आप कौन ? पुरुष के लिए }
भवती का ? { आप कौन ? स्त्री के लिए } 
                                                              अभ्यासः 
मम पञ्च मित्राणि 


                                                                      

भवान् कः ?                                                       अहं चिकित्सकः 



                            
भवान् कः ?                                                            अहं व्यापारी ॥




भवान् कः ?                                                   अहं अभियन्ता 




भवती का ?                                                            अहं लेखिका 
                                                                       
भवती का ?                                                               अहं रक्षिका 
 अधुना मम प्रश्नः                                 भवान् कः ? भवती का ?
क्रमशः ..........................
                                       शुभम अस्तु 

            



Saturday, September 04, 2010

प्रथमः पाठः

                                प्रथमः पाठः
नमो-नमः 

स्व परिचयः
मम नाम भूपेन्द्रः [मेरा नाम भूपेंद्र है] 

भवतः नाम किम् ? [पुरुष से -आपका क्या नाम है?] 

भवत्यः नाम किम् ?[स्त्री से-आपका क्या नाम है ?]

सः बालकः [ वह बालक है ]

सः कः ?[ वह कौन ] 

सा बालिका [ वह बालिका है ]

सा का? [ वह कौन]

तत् पुष्पम् [ वह फूल है ]

तत् किम् [ वह क्या है 

Friday, September 03, 2010

sanskrit ke patha

Shabd roop