श्री मद गुरुभ्यो नमः

श्री मद गुरुभ्यो नमः

Friday, February 18, 2011

ऋग्वेद की कुछ सूक्तियाँ


ऋग्वेद की कुछ सूक्तियाँ

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति।
सूरयः दिवीव चक्षुराततम्।।
विद्वान लोग गगन में निबद्ध दृष्टि के समान विष्णु के उस परम पद को सदैव देखते रहते हैं।

विद्वान् पथः पुरएत ऋजु नेषति।
विद्वान गण पुरोगामी होकर सरल पथ से मनुष्यों का नेतृत्व करें।

उत पश्यन्नश्नुवन् दीर्घमायु।
रस्तमिवेज्जरिमाणं जगम्याम्।।
देखते हुए और दीर्घायु भोगते हुए हम वृद्धावस्था में वैसे ही प्रवेश करें, जैसे अपने घर में।

यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागोऽस्ति।
यदीं श्रृणोत्यलकं श्रृणोति न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम्।।
जो मनुष्य सदैव साथ रहने वाले मित्र की तरह वेद का त्याग कर देता है, उसकी वाणी में सफलता नहीं होती। वह जो सुनता है, व्यर्थ सुनता है। वह पुण्य-पथ को नहीं जानता।

इला सरस्वती मही तिस्त्रो देवीर्मयोभुवः।
मातृभूमि, मातृसंस्कृति और मातृभाषा—ये तीनों सुखद होती हैं।

अर्यो दिधिष्वो त्रिभुजाः अतृष्यन्सिः अपसः प्रयसा वर्धयन्तीः।
राष्ट्र की जनता धनी, पोषक, अतुष्यालु, कर्मठ और दानशील हो।

उत्तिष्ठित ! जाग्रत ! प्राप्यपरान निरोधक।
उठो, जागो ! सद्गुरुओं द्वारा ज्ञान प्राप्त करो।

गुरुपोदेश तोइयेयं न च शास्त्रर्थ कोटिभिः।
केवल शास्त्रों के आधार पर नहीं, इस विद्या को गुरु द्वारा सीखें।

यतेमहि स्वराज्ये।
हस स्वराज्य के लिए प्रयत्न करते रहें।

रयिं जागृवांसो अनुग्मन्।
जागरुक जन ऐश्वर्य पाते हैं।

अश्याम तं कामभग्ने तवोती।
हे तेजस्विन ! आपके संरक्षण में हम सभी प्रकार की समृद्धि प्राप्त करें।

सुवीर्यस्व पतयः स्याम।
हम उत्तम शक्ति के स्वामी बनें।

भूवो विश्वेभिः सुमना अनीकैः।
सभी सैनिकों के साथ सद्व्यवहार करें।

पुरुष एवेदं सर्व सद्भूतं यच्च भाव्यम्।
काल की सावधिकता के परे इसी तत्व की स्थिति है।

पादोऽस्य विश्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।
सभी जीव-जड़ इसी के आधीन हैं तथा अमर तत्व भी यही है।

श्रद्धायाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः।
श्रद्धा से ब्रह्म तेज प्रज्वलित होता है और श्रद्धापूर्वक ही हवि अर्पण किया जाता है।

प्रियं श्रद्धे ददतः प्रियं श्रद्धे दिदासतः।
हे श्रद्धा ! दान देने वाले का प्रिय कर, दान देने की इच्छा रखने वाले का भी प्रिय कर अर्थात् उन्हें अभीष्ट फल प्रदान कर।

श्रद्धां हृदय्या याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु।
सब लोग हृदय के दृढ़ संकल्प से श्रद्धा की उपासना करते हैं क्योंकि श्रद्धा से ही ऐश्वर्य प्राप्त होता है।

श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि।
श्रद्धां सूर्यस्य निम्रु चि श्रद्धे श्रद्धापयेहनः।।
हम प्रातःकाल, मध्याह्न काल और सूर्यास्त वेला में अर्थात् सायंकाल श्रद्धा की उपासना करते हैं। हे श्रद्धा ! हमें इस विश्व अथवा कर्म में श्रद्धावान कर।

Thursday, February 17, 2011

हिंदी की सूक्तियां-धन / अर्थ / अर्थ महिमा / अर्थ निन्दा / अर्थ शास्त्र /सम्पत्ति / ऐश्वर्य


धन / अर्थ / अर्थ महिमा / अर्थ निन्दा / अर्थ शास्त्र /सम्पत्ति / ऐश्वर्य
दान , भोग और नाश ये धन की तीन गतियाँ हैं । जो न देता है और न ही भोगता है, उसके धन की तृतीय गति ( नाश ) होती है ।
— भर्तृहरि
हिरण्यं एव अर्जय , निष्फलाः कलाः । ( सोना ( धन ) ही कमाओ , कलाएँ निष्फल है )
— महाकवि माघ
सर्वे गुणाः कांचनं आश्रयन्ते । ( सभी गुण सोने का ही सहारा लेते हैं )
- भर्तृहरि
संसार के व्यवहारों के लिये धन ही सार-वस्तु है । अत: मनुष्य को उसकी प्राप्ति के लिये युक्ति एवं साहस के साथ यत्न करना चाहिये ।
— शुक्राचार्य
आर्थस्य मूलं राज्यम् । ( राज्य धन की जड है )
— चाणक्य
मनुष्य मनुष्य का दास नही होता , हे राजा , वह् तो धन का दास् होता है ।
— पंचतंत्र
अर्थो हि लोके पुरुषस्य बन्धुः । ( संसार मे धन ही आदमी का भाई है )
— चाणक्य
जहाँ सुमति तँह सम्पति नाना, जहाँ कुमति तँह बिपति निधाना ।
— गो. तुलसीदास
क्षणशः कण्शश्चैव विद्याधनं अर्जयेत ।
( क्षण-ख्षण करके विद्या और कण-कण करके धन का अर्जन करना चाहिये ।
रुपए ने कहा, मेरी फिक्र न कर – पैसे की चिन्ता कर.
-– चेस्टर फ़ील्ड
बढ़त बढ़त सम्पति सलिल मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत पुनि ना घटै तब समूल कुम्हिलाय।।
——(मुझे याद नहीं)
जहां मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहां अन्न की सुरक्षा की जाती है और जहां परिवार में कलह नहीं होती, वहां लक्ष्मी निवास करती है ।
–अथर्ववेद
मुक्त बाजार ही संसाधनों के बटवारे का सवाधिक दक्ष और सामाजिक रूप से इष्टतम तरीका है ।
स्वार्थ या लाभ ही सबसे बडा उत्साहवर्धक ( मोटिवेटर ) या आगे बढाने वाला बल है ।
मुक्त बाजार उत्तरदायित्वों के वितरण की एक पद्धति है ।
सम्पत्ति का अधिकार प्रदान करने से सभ्यता के विकास को जितना योगदान मिला है उतना मनुष्य द्वारा स्थापित किसी दूसरी संस्था से नहीं ।
यदि किसी कार्य को पर्याप्त रूप से छोटे-छोटे चरणों मे बाँट दिया जाय तो कोई भी काम पूरा किया जा सकता है ।



हिंदी की सूक्तियां-मान , अपमान , सम्मान


मान , अपमान , सम्मान
धूल भी पैरों से रौंदी जाने पर ऊपर उठती है, तब जो मनुष्य अपमान को सहकर भी स्वस्थ रहे, उससे तो वह पैरों की धूल ही अच्छी।
- माघकाव्य
इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी उपलब्धियों के लिए सम्मानित नहीं किया जाता। समाज तो उसी का सम्मान करता है, जिससे उसे कुछ प्राप्त होता है।
- कल्विन कूलिज
अपमानपूर्वक अमृत पीने से तो अच्छा है सम्मानपूर्वक विषपान |
-– रहीम
अपमान और दवा की गोलियां निगल जाने के लिए होती हैं, मुंह में रखकर चूसते रहने के लिए नहीं।
- वक्रमुख
गाली सह लेने के असली मायने है गाली देनेवाले के वश में न होना, गाली देनेवाले को असफल बना देना। यह नहीं कि जैसा वह कहे, वैसा कहना।
- महात्मा गांधी
मान सहित विष खाय के , शम्भु भये जगदीश ।
बिना मान अमृत पिये , राहु कटायो शीश ॥
— कबीर

हिंदी की सूक्तियां-प्रशंसा / प्रोत्साहन


प्रशंसा / प्रोत्साहन
उष्ट्राणां विवाहेषु , गीतं गायन्ति गर्दभाः ।
परस्परं प्रशंसन्ति , अहो रूपं अहो ध्वनिः ।
( ऊँटों के विवाह में गधे गीत गा रहे हैं । एक-दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं , अहा ! क्या रूप है ? अहा ! क्या आवाज है ? )
मानव में जो कुछ सर्वोत्तम है उसका विकास प्रसंसा तथा प्रोत्साहन से किया जा सकता है ।
–चार्ल्स श्वेव
आप हर इंसान का चरित्र बता सकते हैं यदि आप देखें कि वह प्रशंसा से कैसे प्रभावित होता है ।
— सेनेका
मानव प्रकृति में सबसे गहरा नियम प्रशंसा प्राप्त करने की लालसा है ।
— विलियम जेम्स
अगर किसी युवती के दोष जानने हों तो उसकी सखियों में उसकी प्रसंसा करो ।
— फ्रंकलिन
चापलूसी करना सरल है , प्रशंसा करना कठिन ।
मेरी चापलूसी करो, और मैं आप पर भरोसा नहीं करुंगा. मेरी आलोचना करो, और मैं आपको पसंद नहीं करुंगा. मेरी उपेक्षा करो, और मैं आपको माफ़ नहीं करुंगा. मुझे प्रोत्साहित करो, और मैं कभी आपको नहीं भूलूंगा
-– विलियम ऑर्थर वार्ड
हमारे साथ प्रायः समस्या यही होती है कि हम झूठी प्रशंसा के द्वारा बरबाद हो जाना तो पसंद करते हैं, परंतु वास्तविक आलोचना के द्वारा संभल जाना नहीं |
-– नॉर्मन विंसेंट पील

हिंदी की सूक्तियां-सुख-दुःख , व्याधि , दया


सुख-दुःख , व्याधि , दया
संसार में सब से अधिक दुःखी प्राणी कौन है ? बेचारी मछलियां क्योंकि दुःख के कारण उनकी आंखों में आनेवाले आंसू पानी में घुल जाते हैं, किसी को दिखते नहीं। अतः वे सारी सहानुभूति और स्नेह से वंचित रह जाती हैं। सहानुभूति के अभाव में तो कण मात्र दुःख भी पर्वत हो जाता है।
- खलील जिब्रान
संसार में प्रायः सभी जन सुखी एवं धनशाली मनुष्यों के शुभेच्छु हुआ करते हैं। विपत्ति में पड़े मनुष्यों के प्रियकारी दुर्लभ होते हैं।
- मृच्छकटिक
व्याधि शत्रु से भी अधिक हानिकारक होती है।
- चाणक्यसूत्राणि-२२३
विपत्ति में पड़े हुए का साथ बिरला ही कोई देता है।
- रावणार्जुनीयम्-५।८
मनुष्य के जीवन में दो तरह के दुःख होते हैं - एक यह कि उसके जीवन की अभिलाषा पूरी नहीं हुई और दूसरा यह कि उसके जीवन की अभिलाषा पूरी हो गई।
- बर्नार्ड शॉ
मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरे पास जो भी थोड़ा-बहुत धन शेष है, वह सार्वजनिक हित के कामों में यथाशीघ्र खर्च हो जाए। मेरे अंतिम समय में एक पाई भी न बचे, मेरे लिए सबसे बड़ा सुख यही होगा।
- पुरुषोत्तमदास टंडन
मानवजीवन में दो और दो चार का नियम सदा लागू होता है। उसमें कभी दो और दो पांच हो जाते हैं। कभी ऋण तीन भी और कई बार तो सवाल पूरे होने के पहले ही स्लेट गिरकर टूट जाती है।
- सर विंस्टन चर्चिल
तपाया और जलाया जाता हुआ लौहपिण्ड दूसरे से जुड़ जाता है, वैसे ही दुख से तपते मन आपस में निकट आकर जुड़ जाते हैं।
-लहरीदशक
रहिमन बिपदा हुँ भली , जो थोरे दिन होय ।
हित अनहित वा जगत में , जानि परत सब कोय ॥
— रहीम
चाहे राजा हो या किसान , वह सबसे ज्यादा सुखी है जिसको अपने घर में शान्ति प्राप्त होती है ।
— गेटे
अरहर की दाल औ जड़हन का भात
गागल निंबुआ औ घिउ तात
सहरसखंड दहिउ जो होय
बाँके नयन परोसैं जोय
कहै घाघ तब सबही झूठा
उहाँ छाँड़ि इहवैं बैकुंठा
—–घाघ

हिंदी की सूक्तियां-सफलता, असफलता


सफलता, असफलता
असफलता यह बताती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया
गया ।
— श्रीरामशर्मा आचार्य
जीवन के आरम्भ में ही कुछ असफलताएँ मिल जाने का बहुत अधिक व्यावहारिक महत्व है ।
— हक्सले
जो कभी भी कहीं असफल नही हुआ वह आदमी महान नही हो सकता ।
— हर्मन मेलविल
असफलता आपको महान कार्यों के लिये तैयार करने की प्रकृति की योजना है ।
— नैपोलियन हिल
सफलता की सभी कथायें बडी-बडी असफलताओं की कहानी हैं ।
असफलता फिर से अधिक सूझ-बूझ के साथ कार्य आरम्भ करने का एक मौका मात्र है ।
— हेनरी फ़ोर्ड
दो ही प्रकार के व्यक्ति वस्तुतः जीवन में असफल होते है - एक तो वे जो सोचते हैं, पर उसे कार्य का रूप नहीं देते और दूसरे वे जो कार्य-रूप में परिणित तो कर देते हैं पर सोचते कभी नहीं।
- थामस इलियट
दूसरों को असफल करने के प्रयत्न ही में हमें असफल बनाते हैं।
- इमर्सन
- हरिशंकर परसाई
किसी दूसरे द्वारा रचित सफलता की परिभाषा को अपना मत समझो ।
जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं । पहले वे जो सोचते हैं पर करते नहीं , दूसरे वे जो करते हैं पर सोचते नहीं ।
— श्रीराम शर्मा , आचार्य
प्रत्येक व्यक्ति को सफलता प्रिय है लेकिन सफल व्यक्तियों से सभी लोग घृणा करते हैं ।
— जान मैकनरो
असफल होने पर , आप को निराशा का सामना करना पड़ सकता है। परन्तु , प्रयास छोड़ देने पर , आप की असफलता सुनिश्चित है।
— बेवेरली सिल्स
सफलता का कोई गुप्त रहस्य नहीं होता. क्या आप किसी सफल आदमी को जानते हैं जिसने अपनी सफलता का बखान नहीं किया हो.
-– किन हबार्ड
मैं सफलता के लिए इंतजार नहीं कर सकता था, अतएव उसके बगैर ही मैं आगे बढ़ चला.
-– जोनाथन विंटर्स
हार का स्‍वाद मालूम हो तो जीत हमेशा मीठी लगती है.
— माल्‍कम फोर्बस
हम सफल होने को पैदा हुए हैं, फेल होने के लिये नही .
— हेनरी डेविड
पहाड़ की चोटी पर पंहुचने के कई रास्‍ते होते हैं लेकिन व्‍यू सब जगह से एक सा दिखता है .
— चाइनीज कहावत
यहाँ दो तरह के लोग होते हैं - एक वो जो काम करते हैं और दूसरे वो जो सिर्फ क्रेडिट लेने की सोचते है। कोशिश करना
कि तुम पहले समूह में रहो क्‍योंकि वहाँ कम्‍पटीशन कम है .
— इंदिरा गांधी
सफलता के लिये कोई लिफ्‍ट नही जाती इसलिये सीढ़ीयों से ही जाना पढ़ेगा
हम हवा का रूख तो नही बदल सकते लेकिन उसके अनुसार अपनी नौका के पाल की दिशा जरूर बदल सकते हैं।
सफलता सार्वजनिक उत्सव है , जबकि असफलता व्यक्तिगत शोक ।
मैं नही जानता कि सफलता की सीढी क्या है ; असफला की सीढी है , हर किसी को प्रसन्न करने की चाह ।
— बिल कोस्बी
सफलता के तीन रहस्य हैं - योग्यता , साहस और कोशिश ।

हिंदी की सूक्तियां-भय, अभय , निर्भय


भय, अभय , निर्भय
तावत् भयस्य भेतव्यं , यावत् भयं न आगतम् ।
आगतं हि भयं वीक्ष्य , प्रहर्तव्यं अशंकया ॥
भय से तब तक ही दरना चाहिये जब तक भय (पास) न आया हो । आये हुए भय को देखकर बिना शंका के उस पर् प्रहार् करना चाहिये ।
— पंचतंत्र
जो लोग भय का हेतु अथवा हर्ष का कारण उपस्थित होने पर भी विचार विमर्श से काम लेते हैं तथा कार्य की जल्दी से नहीं कर डालते, वे कभी भी संताप को प्राप्त नहीं होते।
- पंचतंत्र
‘भय’ और ‘घृणा’ ये दोनों भाई-बहन लाख बुरे हों पर अपनी मां बर्बरता के प्रति बहुत ही भक्ति रखते हैं। जो कोई इनका सहारा लेना चाहता है, उसे ये सब से पहले अपनी मां के चरणों में डाल जाते हैं।
- बर्ट्रेंड रसेल
मित्र से, अमित्र से, ज्ञात से, अज्ञात से हम सब के लिए अभय हों। रात्रि के समय हम सब निर्भय हों और सब दिशाओं में रहनेवाले हमारे मित्र बनकर रहें।
- अथर्ववेद
आदमी सिर्फ दो लीवर के द्वारा चलता रहता है : डर तथा स्वार्थ |
-– नेपोलियन
डर सदैव अज्ञानता से पैदा होता है |
-– एमर्सन
अभय-दान सबसे बडा दान है ।
भय से ही दुख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयां उत्पन्न होती हैं ।
— विवेकानंद